बाली कौन था उसका वध किसके द्वारा और किस प्रकार हुआ? - baalee kaun tha usaka vadh kisake dvaara aur kis prakaar hua?

राम-कथा के नाम पर हिंदू संस्कृति को मानने वाले लोग मुख्य रूप से

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है।(लेखक जानेमाने पौराणिक उपन्यासकार और अनुवादक हैं)आवाज़ : आशिता सेठ*ये लेखक के निजी विचार हैं

राम-कथा के नाम पर हिंदू संस्कृति को मानने वाले लोग मुख्य रूप से महर्षि वाल्मीकि की रामायण और संततुलसीदासकीरामचरित मानसका पाठ करते हैं। रामचरित मानस में श्रीराम को ईश्वर का रूप माना गया है। रामायण में वाल्मीकि ने राम का मर्यादित रूप तो दिखाया है, लेकिन उसका मानवीय चेहरा भी पेश किया है। इसलिए कथित तौर पर विष्णु का अवतार होने के कारण राम के स्वभाव में जहां एक ओर दिव्यता का भाव है, वहीं दूसरी ओर उनके भीतर अन्याय के प्रति क्षोभ, क्षति में विषाद, लाभ के क्षणों में हर्ष और अधर्म से सामना होने पर क्रोध जैसे मानवीय भाव भी स्वाभाविक ढंग से उभरते हैं।

रामायण में राम अंत तक खुद को सामान्य मनुष्य ही मानते रहे। उन्होंने किसी भी अवसर पर अपनी दिव्यता का प्रदर्शन नहीं किया। किशोरावस्था में वन में राक्षसों के संहार से लेकर अयोध्या के राजसिंहासन की जगह चौदह वर्षों का वनवास मिलने तक, सुखासन की आयु में कुशासन पर बैठने वाले श्रीराम की कथा में सुख की अपेक्षा दुख के क्षण अधिक हैं। वनवास में कष्ट भोग रहे राम का दुख तब असहनीय हो जाता है, जब राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर लेता है और उन्हें समुद्र पार लंका ले जाता है।

राज्य से वंचित और पत्नी के अपहरण से दुखी राम सामान्य मनुष्य की तरह रोते-बिलखते हैं। उनकी बेचैनी चरम पर जा पहुंचती है और उनका मन रावण के प्रति क्रोध से भर उठता है। वह सीता की खोज में वन-वन भटकते हैं। उनकी भेंट वानर हनुमान से होती है, जो राम को अपने राजा सुग्रीव से मिलवाते हैं। संयोग से, सुग्रीव की हालत भी राम जैसी थी। वह भी राज्य और पत्नी खो चुका था। सुग्रीव की यह दशा किसी दूसरे ने नहीं, बल्कि उसके ही बड़े भाई बाली ने की थी। बाली ने सुग्रीव को उसके अपने राज्य किष्किंधा से निकाल दिया था और सुग्रीव की पत्नी रूमा को भी बलपूर्वक अपने साथ रख लिया था।

राम और सुग्रीव की पीड़ा एक जैसी थी। दोनों से उनका राज्य छीना गया और उनकी पत्नियां दूसरे पुरुषों के कब्ज़े में थीं। इधर, सुग्रीव के पास अपार वानर सेना थी, जो राक्षसों से टक्कर ले सकती थी। उधर, राम के पास अदम्य साहस, दिव्यास्त्र, धर्म का संबल और गुरु का आशीष था। दोनों को एक-दूसरे का मित्र बन जाने में लाभ दिखाई पड़ा। अग्नि को साक्षी मानकर सुग्रीव और राम मित्र हो गए। दोनों ने एक-दूसरे की सहायता करने की प्रतिज्ञा की।

सुग्रीव का राज्य और पत्नी वापस पाने के लिए बाली को हराना आवश्यक था। लेकिन यह सरल काम नहीं था। बाली ऐसा था कि सूरज उगने से पहले बिना थके पृथ्वी की परिक्रमा कर सकता था। उसका पौरुष और पराक्रम ऐसा था कि उसने युद्ध में रावण तक को धूल चटा दी और उसे कांख में दबाकर छह महीने तक घूमता रहा। बाली को मारने में एक और बड़ी बाधा थी। उसे वरदान मिला था कि उससे जो भी सामने से लड़ता, उसकी आधी शक्ति बाली में चली जाती थी। यही वजह थी कि सुग्रीव बहुत प्रयास करके भी बाली को हरा नहीं पाया। बाली को मिले वरदान के चलते उससे आमने-सामने युद्ध करना राम के लिए भी कठिन था। आखिर यह नतीजा निकला कि बाली को सीधी लड़ाई में हराना संभव नहीं है, इसलिए उसे छिपकर मारा जाए। राम ने यही किया।

योजना बनाई गई। राम के संकेत पर सुग्रीव ने बाली को उकसाया और उसे युद्ध के लिए ललकारा। बाली क्रोध में सुग्रीव से लड़ने आ गया। उधर पेड़ की ओट में राम धनुष-बाण लिए तैयार थे।बाली और सुग्रीवका युद्ध शुरू हुआ तो राम ने अवसर मिलते ही बाली पर बाण चला दिया। बाली धरती पर गिरा और कराहने लगा। उसे जब पता लगा कि राम ने उसे छिपकर मारा था तो उसे बहुत क्रोध आया। उसने राम पर अधर्म और पाप का दोष लगा दिया। राम का बाली से न तो सीधा वैर था और न ही बाली ने राम को कोई नुकसान पहुंचाया था। बाली-वध की घटना ने राम के निष्कपट जीवन पर हमेशा के लिए एक सवाल खड़ा कर दिया।

लेकिन राम ने जो किया, उसे सही संदर्भ में समझना जरूरी है। राम चाहते तो शांति से खड़े रहकर बाली के मरने की प्रतीक्षा कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। राम मनुष्य रूप में दिव्य चेतना का स्वरूप थे। उन्हें पता था कि आगे चलकर यह घटना जनमानस में धर्म-अधर्म को लेकर दुविधा पैदा करेगी। वह यह भी जानते थे कि बाली के मन में भी अपने हंता यानी राम के प्रति दुश्मनी का भाव होगा और वह अंत समय में राम को अधर्मी मानकर ही परलोक सिधार जाएगा। इसलिए राम ने बाली से मिलकर यह गलतफ़हमी दूर करने का निश्चय किया।

राम बाली के पास पहुंचे। बाली ने पूछा, 'श्रीराम! आपने मुझे छल से मारकर क्या पाया?' उसने राम को अधर्मी और पापाचारी कहा। बाली ने कहा, 'हम तो वानर हैं, इसलिए हमारी बुद्धि पशुओं के समान है लेकिन आप केवल मनुष्य ही नहीं, राजा भी हैं। राजा के चार गुण बताए गए हैं। क्षमा, दान, धर्म और सत्य। फिर आपने मुझ निरपराधी को मारकर धर्म का उल्लंघन क्यों किया? आपने सीता को खोजने के लिए सुग्रीव से मित्रता की, लेकिन मुझसे आपका क्या वैर था जो आपने मेरा वध कर दिया? मुझे मरने का दुख नहीं है। दुख यह है कि मेरा वध छल और अधर्म का सहारा लेकर किया गया।'

राम का सोचना सही था। बाली ने उनके आचरण पर प्रश्नचिह्न लगाए और उन्हें अधर्मी घोषित कर दिया। बाली के आरोप के जवाब में राम ने कहा, 'बाली, तुम मुझे दोष दे रहे हो क्योंकि तुम धर्म और लोकाचार के बारे में नहीं जानते। देश में महाराज भरत का शासन है। उनकी आज्ञा है कि जहां भी अधर्म दिखे, उसे समाप्त कर दिया जाए। छोटा भाई, पुत्र के जैसा होता है और उसकी पत्नी, पुत्रवधू के समान होती है। तुमने अपने छोटे भाई सुग्रीव का राज्य छीना और उसकी पत्नी रूमा को बलपूर्वक अपने साथ रहने पर मजबूर किया। यही नहीं, कामासक्त होकर तुमने रूमा के साथ पापकर्म भी किया। यह धर्म का सीधा उल्लंघन है। इस अपराध के लिए मृत्यु से कम कोई दंड नहीं है। तुम्हें मारने का दूसरा कारण यह है कि सुग्रीव मेरा मित्र है और मैंने उसे वचन दिया था कि मैं उसका राज्य और पत्नी वापस दिलवाऊंगा। बाली, मैं महाराज रघु का वंशज हूं। मैं अपने प्राण तो दे सकता हूं, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं टूटने दूंगा। कोई पापी अगर राजा से पाप के लिए क्षमा मांगे और राजा उसे क्षमा कर दे तो अलग बात है, लेकिन धर्म कहता है पापी को दंड न देने से राजा खुद पाप का भागी बनता है। इसलिए तुम्हारा अपराध जानने के बाद भी तुम्हें दंडित न करने से मुझे पाप लगेगा और भरत की छवि धूमिल होगी। छिपकर तुम्हारा वध करने का तीसरा कारण यह है कि तुम शाखामृग (वानर) हो। धर्म को जानने वाले बड़े-बड़े राजर्षि भी फंदा लगाते हैं और छिपकर छल से शिकार करते हैं। इसलिए तुम्हारा छिपकर शिकार करके मैंने धर्म का उल्लंघन नहीं किया।'

श्रीराम का यह उत्तर सुनकर बाली ने स्वीकार किया कि सुग्रीव का राज्य और उसकी पत्नी छीनकर उसने भारी भूल की। उसने श्रीराम पर लगाया अधर्म का आरोप भी वापस ले लिया। राम-बाली के इस संवाद से साफ है कि राम पर लगा यह आरोप झूठा है कि उन्होंने बाली को मारकर धर्म का उल्लंघन किया।

श्रीराम ने बाली का वध करके धर्म का पालन तो कर लिया, लेकिन वह अपने कर्म से मुक्त नहीं हो पाए। कर्म का सिद्धांत अकाट्य है। राम ने जिस तरह शिकारी की तरह छिपकर बाली को मारा, समय आने पर राम को भी अपने कर्म का फल भोगना पड़ा। कहते हैं, त्रेता युग खत्म होने पर द्वापर युग में विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लिया। तब बाली ही व्याध बनकर पैदा हुआ। अंत समय में उसने कृष्ण के पैर को हिरण का मुंह समझकर बाण चलाया जिससे कृष्ण की मृत्यु हो गई। इस प्रकार राम का कर्म-चक्र पूरा हुआ।

बाली-वध का प्रकरण वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा-कांड से लिया गया है। इसका उद्देश्य लोगों तक यह संदेश पहुंचाना है कि कई बार हम तथ्यों की अनदेखी कर देते हैं और केवल वही देखते-पढ़ते-सुनते हैं जो हम देखना-पढ़ना-सुनना चाहते हैं। हमने इस प्रसंग में देखा किस तरह बाली ने राम पर अधर्मी होने का आरोप लगाया लेकिन अंत में सिद्ध यह हुआ कि वास्तव में अधर्म बाली ने किया था। इसलिए धर्म-अधर्म का पूर्ण ज्ञान न हो तो श्रेष्ठ पुरुषों पर आरोप लगाना, आत्म-ग्लानि और अपराध-बोध का कारण बन सकता है।

बाली का वध किसने किया और क्यों किया?

वालि (संस्कृत) या बालि रामायण का एक पात्र है। वह सुग्रीव का बड़ा भाई था। वह किष्किन्धा का राजा था, इन्द्र का पुत्र बताया जाता है तथा बंदरों के रूप थे। राम रूपी विष्णु ने उसका वध किया

बाली की मृत्यु कैसे हुई?

पौराणिक मान्यताओं अनुसार प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

बाली का वध क्यों हुआ?

वानर राज बाली को तपस्या भंग करने की वजह से मतङ्ग ऋषि का श्राप मिला था कि अगर वह ऋष्यमूक पर्वत के समीप या पर्वत क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसके लिए बाली ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जाता था। यह जान सुग्रीव पर्वत जा छिपा था। रामायण में वानर राज बाली और सुग्रीव की कथा का वर्णन विस्तार से बताया गया है।

बाली किसका भक्त था?

बालि गदा और मल्ल युद्ध में पारंगत था। उसमें उड़ने की शक्ति भी थी। धरती पर उसे सबसे शक्तिशाली माना जाता था, लेकिन उसमें साम्राज्य विस्तार की भावना नहीं थी। वह भगवान सूर्य का उपासक और धर्मपरायण था